मुस्लिम वोटों के लिए चुनावी शतरंज का खेल ?
सोमेश कुमार चौधरी
सोमेश कुमार चौधरी
बिहार चुनाव के तारिख की घोषणा अंतिम चरण तक पहुंचने के बाद भी तमाम उतार चढ़ावों के बीच फंसे मुस्लिम मतदाता बिखराव व भटकाव की स्थिति से उबर नहीं पाए हैं, लिहाजा राजनीति के बड़े-बड़े जानकार भी बिहार के मुस्लिम मतदाताओं का रुझान भांप पाने की स्थिति में नहीं हैं। दरअसल ऊहापोह की माकूल वजह भी है।
सियासी दल सिर्फ चुनाव के समय ही मुसलमानों के प्रति संजीदगी दिखाते हैं। इससे यह समाज अपने को छला सा महसूस करता है। सभी प्रमुख दल मुस्लिमों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के बजाय उनके राजनीतिक वजूद को ज्यादा महत्व देते हैं। आजादी के बाद से ही ये भारत के नागरिक कम वोटर ज्यादा बन गये हैं।
मुस्लिम बुद्धिजीवियों का मानना है कि मुल्क के पहले ही आम चुनाव से राजनीतिक दलों का एक खेमा हमदर्द तो दूसरा विरोधी बनकर मुसलमानों का सियासी इस्तेमाल करता रहा है। सच्चाई यह है कि करोड़ों की आबादी का यह हिस्सा आजादी के इतने वर्षो बाद भी अशिक्षा, गरीबी और बदहाल जिंदगी जीने को मजबूर है। इस चुनाव में भी राजनीतिक दलों ने चुनावी बिसात पर अपनी गोट फिर बिछा दी है। तमाम तथाकथित पंथनिरपेक्ष मुसलमानों को बाबरी विध्वंस, गुजरात और मुजफ्फरनगर दंगे की याद दिलायी जा रही है। भागलपुर दंगा करने वाले समेत कई छोटे दल भी मुस्लिम हितैषी होने का दम भर रहे हैं। यही नहीं भाजपा तक उनके दिल से जुड़े मुद्दों मसलन उर्दू के विकास, मदरसों के आधुनिकीकरण कर राष्ट्रीय धारा से जोड़ने आदि का प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर कई जगह उनके वोट पाने का प्रयास कर रही है। हालांकि इस चुनाव में भाजपा के प्रति मुसलमानों का भाव भी चौकाने वाले देखने को मिल रहा जो आगे के लिए काफी मायनेखेज साबित हो सकता है। महागठबंधन दलों में मुस्लिमों का भाजपा के प्रति यह अपेक्षाकृत सहज भाव बेचैनी पैदा कर रहा है। नतीजतन कोई भी मुस्लिम मतों की थोक ठेकेदारी का दावा कर पाने की स्थिति में नहीं है।भाजपा मे बड़े बड़े मुस्लिम नेता शामिल हो रहे हैं ,मुस्लिम मतों के बिखराव के लिए साबिर अली ,जमशेद अशरफ ,जैसे नेताओं को प्रोमोटकर भाजपा अलग से मुस्लिम नेताओं की पार्टी बनवाना चाहती है,बिहार में मुस्लिम वोटों पर कब्जे के लिए जोड़-जुगाड़ शुरू हो गया है। राजद इसे संभाल कर रखना चाह रहा है तो जदयू हथियाने की कोशिशों में जुटा है। कांग्रेस की मंशा अपने खोये आधार को फिर से प्राप्त करने की है। मुस्लिम राजनीति का मतलब भाजपा के लिए कुछ और होता है। नीतीश कुमार से अलग होकर जीतनराम मांझी को भी पसमांदा मुसलमानों से खासा उम्मीद है। मगर उनकी पार्टी हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) ने अभी तक कोई खास रणनीति नहीं बनाई है। भाजपा और उसका गठबंधन 30 से ज्यादा मुस्लिम नेताओं को उतारकर ,महागठबंधन की नींद हराम केर सकती है I बिहार में 2005 में मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाने के नाम पर चुनाव लड़कर 29 सीटें जीत चुके रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा के लिए भी मुस्लिम मतदाता इस बार पहेली से कम नहीं होंगे। लोकसभा में भाजपा से गठबंधन के बाद अब विधानसभा में भी यह देखना होगा कि मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव लोजपा के पक्ष में किस हद तक हो सकता है। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा ने खुलकर कभी मुस्लिम राजनीति नहीं की और वर्तमान गठबंधन का समीकरण भी बता रहा है कि इस दिशा में उसे अभी बहुत काम करना होगा। बिहार में मुसलमान कभी वामदलों का आधार हुआ करते थे मगर अब उसकी हालत लगभग कांग्रेस की तरह हो गई है। मुस्लिम मतों को लेकर कांग्रेस की रणनीति अभी तक परंपरागत ही है। यह बहुत हद तक राजद-जदयू के गठबंधन के स्वरूप पर भी निर्भर करेगी। वैसे भी कांग्रेस अभी वेट एंड वॉच की स्थिति में दिख रही है।
पिछले चुनाव में मुसलमान
2010 के विधानसभा चुनाव में विभिन्न दलों से 19 मुस्लिम विधायक जीतकर आए। यह संख्या 2005 के चुनाव से तीन अधिक है। हालांकि 37 मुस्लिम प्रत्याशियों का प्रदर्शन भी बेहतर था और वे दूसरे नंबर पर थे। इसमें यह भी उल्लेखनीय है कि चार मुस्लिम प्रत्याशियों को इसी समुदाय के प्रतिद्वंद्वियों ने हराया था। अब देखना और दिलचस्प होगा की महागठबंधन मे किस मुस्लिम विधायक का टिकट कटता है ,एवं उनकी कितनी वफादारी रहती है ,मशलन भीतरघात का प्रतिशत कितना रहता है I
इसका अप्रत्यक्ष लाभ भाजपा को मिलने की संभावना है। मतों के बिखराव को रोकने के लिए कुछ कट्टरपंथी संगठन गैर भाजपाई दलों के बीच एका की अपील करने निकल पड़े हैं। कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवियों का यह भी मानना है कि राजनीतिक कारणों के अलावा भी कई अन्य कारण हैं जो इस समुदाय के बीच महत्व रखते हैं। मुस्लिमों की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक स्थिति पर नजर डालने से भी समुदाय की बेचैनी की झलक मिल रही है।
एक सर्वेक्षण के मुताबिक सर्वाधिक मुस्लिम आबादी मजदूर, दस्तकार या अन्य छोटे-मोटे कार्य करने वाली ही है। मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा की स्थिति तो अत्यंत निराशाजनक है। कुल मुस्लिम आबादी का लगभग पांचवां हिस्सा बीस फीसदी मध्य वर्ग है। इसकी आकांक्षाएं भी अन्य हिंदुओं की तरह बढ़ रही हैं। वे अब बाजारोन्मुखी हो रहे हैं। क्रय शक्ति बढ़ाने के लिए आय स्त्रोत बढ़ने जरूरी हैं। यह वर्ग हिंदू-मुस्लिम झगड़े से ऊपर उठकर विकास का वाहक बन रहा है। यह वर्ग अब आम मतदाताओं की तरह बर्ताव चाहता है।
भाजपा की नजर इस वर्ग के मतदाताओं पर है। आजादी के बाद से मुस्लिम आबादी की वृद्धि लगभग साढ़े पांच गुना से भी ज्यादा हुई, जबकि हिंदुओं की आबादी तीन गुना बढ़ी। वजह अशिक्षा कहें या कुछ और, यह बढ़ी हुई आबादी उनकी समस्याओं में से एक है। अशिक्षा और जागरुकता के अभाव के कारण समय परिवर्तन के साथ यह वर्ग अपने को ढालने की कोशिश कर रहा है। मुसलमानों की ज्यादा आबादी वृद्धि तथा कम आय आजादी के बाद छाछठ वर्षो की राजनीति का परिणाम है। इस लोकसभा चुनाव में भी मुसलमान मतदाता अपने को ठगा महसूस कर रहा है। यही वजह है कि उसका बौद्धिक वर्ग व राजनीतिक नेतृत्व का एक हिस्सा सारे विकल्पों से निराश होकर अन्तिम विकल्प के रूप में अब भाजपा को भी आजमा सकता है। इन सबके बावजूद सब मिलाकर यही कहा जा सकता है कि मुसलमान अभी भी राजनीति के चौराहे पर ही खड़ा है।
बिहार विस में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व
वर्ष सीट प्रतिशत
1952 24 7.27
1957 25 7.84
1962 21 6.60
1967 18 5.66
1969 19 5.97
1972 25 7.85
1977 25 7.72
1980 28 8.64
1985 34 10.50
1990 20 6.19
1995 19 5.88
2000 20 9.87
2005 16 6.58
2010 19 7.81
(कुल सीट 324, 323 तथा 243 के आधार पर)
सियासी दल सिर्फ चुनाव के समय ही मुसलमानों के प्रति संजीदगी दिखाते हैं। इससे यह समाज अपने को छला सा महसूस करता है। सभी प्रमुख दल मुस्लिमों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के बजाय उनके राजनीतिक वजूद को ज्यादा महत्व देते हैं। आजादी के बाद से ही ये भारत के नागरिक कम वोटर ज्यादा बन गये हैं।
मुस्लिम बुद्धिजीवियों का मानना है कि मुल्क के पहले ही आम चुनाव से राजनीतिक दलों का एक खेमा हमदर्द तो दूसरा विरोधी बनकर मुसलमानों का सियासी इस्तेमाल करता रहा है। सच्चाई यह है कि करोड़ों की आबादी का यह हिस्सा आजादी के इतने वर्षो बाद भी अशिक्षा, गरीबी और बदहाल जिंदगी जीने को मजबूर है। इस चुनाव में भी राजनीतिक दलों ने चुनावी बिसात पर अपनी गोट फिर बिछा दी है। तमाम तथाकथित पंथनिरपेक्ष मुसलमानों को बाबरी विध्वंस, गुजरात और मुजफ्फरनगर दंगे की याद दिलायी जा रही है। भागलपुर दंगा करने वाले समेत कई छोटे दल भी मुस्लिम हितैषी होने का दम भर रहे हैं। यही नहीं भाजपा तक उनके दिल से जुड़े मुद्दों मसलन उर्दू के विकास, मदरसों के आधुनिकीकरण कर राष्ट्रीय धारा से जोड़ने आदि का प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर कई जगह उनके वोट पाने का प्रयास कर रही है। हालांकि इस चुनाव में भाजपा के प्रति मुसलमानों का भाव भी चौकाने वाले देखने को मिल रहा जो आगे के लिए काफी मायनेखेज साबित हो सकता है। महागठबंधन दलों में मुस्लिमों का भाजपा के प्रति यह अपेक्षाकृत सहज भाव बेचैनी पैदा कर रहा है। नतीजतन कोई भी मुस्लिम मतों की थोक ठेकेदारी का दावा कर पाने की स्थिति में नहीं है।भाजपा मे बड़े बड़े मुस्लिम नेता शामिल हो रहे हैं ,मुस्लिम मतों के बिखराव के लिए साबिर अली ,जमशेद अशरफ ,जैसे नेताओं को प्रोमोटकर भाजपा अलग से मुस्लिम नेताओं की पार्टी बनवाना चाहती है,बिहार में मुस्लिम वोटों पर कब्जे के लिए जोड़-जुगाड़ शुरू हो गया है। राजद इसे संभाल कर रखना चाह रहा है तो जदयू हथियाने की कोशिशों में जुटा है। कांग्रेस की मंशा अपने खोये आधार को फिर से प्राप्त करने की है। मुस्लिम राजनीति का मतलब भाजपा के लिए कुछ और होता है। नीतीश कुमार से अलग होकर जीतनराम मांझी को भी पसमांदा मुसलमानों से खासा उम्मीद है। मगर उनकी पार्टी हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) ने अभी तक कोई खास रणनीति नहीं बनाई है। भाजपा और उसका गठबंधन 30 से ज्यादा मुस्लिम नेताओं को उतारकर ,महागठबंधन की नींद हराम केर सकती है I बिहार में 2005 में मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाने के नाम पर चुनाव लड़कर 29 सीटें जीत चुके रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा के लिए भी मुस्लिम मतदाता इस बार पहेली से कम नहीं होंगे। लोकसभा में भाजपा से गठबंधन के बाद अब विधानसभा में भी यह देखना होगा कि मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव लोजपा के पक्ष में किस हद तक हो सकता है। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा ने खुलकर कभी मुस्लिम राजनीति नहीं की और वर्तमान गठबंधन का समीकरण भी बता रहा है कि इस दिशा में उसे अभी बहुत काम करना होगा। बिहार में मुसलमान कभी वामदलों का आधार हुआ करते थे मगर अब उसकी हालत लगभग कांग्रेस की तरह हो गई है। मुस्लिम मतों को लेकर कांग्रेस की रणनीति अभी तक परंपरागत ही है। यह बहुत हद तक राजद-जदयू के गठबंधन के स्वरूप पर भी निर्भर करेगी। वैसे भी कांग्रेस अभी वेट एंड वॉच की स्थिति में दिख रही है।
पिछले चुनाव में मुसलमान
2010 के विधानसभा चुनाव में विभिन्न दलों से 19 मुस्लिम विधायक जीतकर आए। यह संख्या 2005 के चुनाव से तीन अधिक है। हालांकि 37 मुस्लिम प्रत्याशियों का प्रदर्शन भी बेहतर था और वे दूसरे नंबर पर थे। इसमें यह भी उल्लेखनीय है कि चार मुस्लिम प्रत्याशियों को इसी समुदाय के प्रतिद्वंद्वियों ने हराया था। अब देखना और दिलचस्प होगा की महागठबंधन मे किस मुस्लिम विधायक का टिकट कटता है ,एवं उनकी कितनी वफादारी रहती है ,मशलन भीतरघात का प्रतिशत कितना रहता है I
इसका अप्रत्यक्ष लाभ भाजपा को मिलने की संभावना है। मतों के बिखराव को रोकने के लिए कुछ कट्टरपंथी संगठन गैर भाजपाई दलों के बीच एका की अपील करने निकल पड़े हैं। कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवियों का यह भी मानना है कि राजनीतिक कारणों के अलावा भी कई अन्य कारण हैं जो इस समुदाय के बीच महत्व रखते हैं। मुस्लिमों की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक स्थिति पर नजर डालने से भी समुदाय की बेचैनी की झलक मिल रही है।
एक सर्वेक्षण के मुताबिक सर्वाधिक मुस्लिम आबादी मजदूर, दस्तकार या अन्य छोटे-मोटे कार्य करने वाली ही है। मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा की स्थिति तो अत्यंत निराशाजनक है। कुल मुस्लिम आबादी का लगभग पांचवां हिस्सा बीस फीसदी मध्य वर्ग है। इसकी आकांक्षाएं भी अन्य हिंदुओं की तरह बढ़ रही हैं। वे अब बाजारोन्मुखी हो रहे हैं। क्रय शक्ति बढ़ाने के लिए आय स्त्रोत बढ़ने जरूरी हैं। यह वर्ग हिंदू-मुस्लिम झगड़े से ऊपर उठकर विकास का वाहक बन रहा है। यह वर्ग अब आम मतदाताओं की तरह बर्ताव चाहता है।
भाजपा की नजर इस वर्ग के मतदाताओं पर है। आजादी के बाद से मुस्लिम आबादी की वृद्धि लगभग साढ़े पांच गुना से भी ज्यादा हुई, जबकि हिंदुओं की आबादी तीन गुना बढ़ी। वजह अशिक्षा कहें या कुछ और, यह बढ़ी हुई आबादी उनकी समस्याओं में से एक है। अशिक्षा और जागरुकता के अभाव के कारण समय परिवर्तन के साथ यह वर्ग अपने को ढालने की कोशिश कर रहा है। मुसलमानों की ज्यादा आबादी वृद्धि तथा कम आय आजादी के बाद छाछठ वर्षो की राजनीति का परिणाम है। इस लोकसभा चुनाव में भी मुसलमान मतदाता अपने को ठगा महसूस कर रहा है। यही वजह है कि उसका बौद्धिक वर्ग व राजनीतिक नेतृत्व का एक हिस्सा सारे विकल्पों से निराश होकर अन्तिम विकल्प के रूप में अब भाजपा को भी आजमा सकता है। इन सबके बावजूद सब मिलाकर यही कहा जा सकता है कि मुसलमान अभी भी राजनीति के चौराहे पर ही खड़ा है।
बिहार विस में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व
वर्ष सीट प्रतिशत
1952 24 7.27
1957 25 7.84
1962 21 6.60
1967 18 5.66
1969 19 5.97
1972 25 7.85
1977 25 7.72
1980 28 8.64
1985 34 10.50
1990 20 6.19
1995 19 5.88
2000 20 9.87
2005 16 6.58
2010 19 7.81
(कुल सीट 324, 323 तथा 243 के आधार पर)

