Saturday, May 2, 2015

Menstrual Hygine Management

नई दिल्ली : जागो गॉव (NGO ) आधी आबादी के ख़ामोशी को तोड़ने के लिए ,उस पर खुल कर चर्चा हो ,28 MAY को गांधी शांति प्रतिष्ठान मे Menstrual hygine management पर वर्कशॉप आयोजित की है I जिसमे देश भर से इस छेत्र से जुड़ी महिलाएं अपना अनुभव रखेगी I
मासिक धर्म और उससे जुड़ी बातों को समाज का रवैया नितांत रूढ़िवादी है , जिसका कारण महिलाओं के जीवन की एक सामान्य क्रिया ,शर्म,लज्जा एवं चुप्पी का विषय बनकर रह गयी है ! इसी सन्दर्व मे जागो गॉव बिहार के बेगूसराय ,समस्तीपुर झारखण्ड के धनबाद एवं गिरिडीह ,दिल्ली के उत्तम नगर एवं सरिता विहार को चिन्हित किया है I जहाँ घर -घर जाकर ,स्कूल ,कॉलेज ,खेत -खलियान ,मंदिर एवं स्वयं सहायता समूह की बैठक बुलाकर माहवारी सम्वन्धी बातो पर खुल कर चर्चा करती है I
जागो गॉव ने दामोदरपुर हाई स्कूल मे 400 छात्राओं के बीच मासिक धर्म पर जागरूकता कार्यकर्म रखा I पूनम वर्ग 10वी का छात्रा बताती है हमारे स्कूल मे शौचालय नहीं है ,जब कभी माहवारी का समय आता है उस समय स्कूल नहीं जाती ,लगभग महीने मे 6 दिन अनुपस्थित रहना परता है I क्योकि मासिक का निश्चित तारीख नहीं है I जागो गॉव के case study के तहत प्रत्येक छात्रा को 40 दिन अनुपस्थित रहती है प्रतिवर्ष I
दामोदरपुर गॉव के वार्ड 5 मे स्वयं सहायता समूह की बैठक माहवारी पर चर्चा के लिए आयोजित किया ,मुन्नी देवी की उम्र ४९ वर्ष बताती है कि उसकी लड़की की शादी थी ,लड़की की शादी के समय मासिक आने से किसी तरह के विध विधान (रस्मो -रिवाज ) मे भाग नहीं ले पायी I आज भी उस पल को याद कर गुस्सा आता है I
दामोदरपुर गॉव के वार्ड 10 की अजनाशा देवी कहती है कि समाज का खेल अजब है " रसोई नहीं जा सकती ,मंदिर मे जाना मना है I पूजा नहीं कर सकती ,यहाँ तक की के साथ बात नहीं कर सकते , लेकिन खेत मे काम करना जाना जरूरी है I महिलाओ को स्वास्थ्य को लेकर अमूमन यही ख़ामोशी है I
गिरिडीह के बरगांडा महिला आदिवासी हॉस्टल के आशा कहती सबसे ज्यादा दिक्कत होती है की माहवारी के कपड़े को धुप मे नहीं सुखाना है ठीक से धूप में ना सुखाए गए हल्के गीले अंडरगार्मेंट्स को पहनने से फंगल इंफ़ेक्शन का ख़तरा बढ़ जाता है जो भारतीय महिलाओं में आम सी बात मानी जाती है.
जागो गॉव ने हालिया अध्ययन में पाया कि 75 फ़ीसदी महिलाएं अब भी पैड किसी भूरे लिफ़ाफ़े या काली पॉलीथीन में लपेटकर ख़रीदती हैं.
अनुसंधान क्षेत्र से जुड़े संगठन एसी नेलसन के ये आंकड़े भारत के लिए शर्मनाक हैं. सिंगापुर और जापान में जहां 100 फ़ीसदी, इंडोनेशिया में 88 फ़ीसदी और चीन में 64 फ़ीसदी महिलाओं को ये सुविधा प्राप्त है वहीं भारत में केवल 12 फ़ीसदी महिलाएं ही माहवारी के दौरान साफ-सुथरे नैपकिन का इस्तेमाल करने में सक्षम हैं I
जागो गॉव ने दामोदरपुर गॉव के case study मे पाया की ग्रामीण स्तर पर 1 फीसदी है I ग्रामीण इलाकों में माहवारी के दौरान महिलाएं आज भी घर के सबसे गंदे कपड़े, टाट-पट्टी यहां तक की रेत और राख का इस्तेमाल केर रही है कई जगह पर इन विषयों पर बातचीत वर्जित है और शर्मनाक माना जाता है

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